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मौत के तीन साल बाद साजिश का ताना-बाना

नई दिल्ली : सीबीआइ के विशेष जज बीएच लोया की हार्टअटैक से हुई जिस मौत पर उनकी पत्नी और बेटे को भी कभी संदेह नहीं हुआ, तीन साल बाद उसकी जांच सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज से कराने की मांग उठने लगी है तो जाहिर तौर पर राजनीति भी जुड़ती है। खासतौर पर इसलिए कि यह ठीक गुजरात चुनाव से पहले उठा था। जज लोया की मौत की साजिश के ताने-बाने को गुजरात के सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ के इर्द-गिर्द बुना गया, जिसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आरोपी थे। वैसे अदालत उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे चुकी है। मुंबई की स्थानीय अदालत में सीबीआइ के विशेष जज लोया की मौत 31 नवंबर और एक दिसंबर 2014 की रात को हार्टअटैक से हुई थी, जहां वे एक सहयोगी जज की बेटी की शादी में शरीक होने गए थे। जाहिर है उनके साथ मुंबई के ही कई दूसरे जज भी थे। खास बात यह है कि हार्टअटैक की सूचना मिलते ही मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के दो न्यायाधीश तत्काल उन्हें देखने अस्पताल पहुंच गए थे और उनकी मौत के समय सात जज अस्पताल में मौजूद थे। हाईकोर्ट के जजों की देख-रेख में ही उनका पोस्टमार्टम हुआ और शव को उनके पैतृक गांव भेजा गया। जाहिर है उनकी मौत पर किसी को आशंका नहीं हुई और किसी ने उसकी जांच की मांग भी नहीं की। तीन साल बाद गुजरात के ठीक पहले एक पत्रिका ने जज लोया की मौत के पीछे बड़ी साजिश का आरोप लगाते हुए खबर छापी। इसमें भी जज लोया बेटे और पत्नी की ओर से कुछ नहीं कहा गया था। बल्कि उनकी बहन और पिता के हवाले से मौत के पीछे साजिश और उसकी जांच की मांग उठाई गई थी। जाहिर है गुजरात चुनाव के पहले छपी इस खबर को आधार बनाकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने भाजपा पर हमला बोल दिया। लेकिन एक हफ्ते के भीतर-भीतर एक राष्ट्रीय अखबार ने जज लोया की मौत के समय मौजूद हाईकोर्ट के दो मौजूदा जजों, जांच व पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों व अन्य चश्मदीद गवाहों से बातचीत कर रिपोर्ट छापी, जिसमें पत्रिका में लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया गया। लेकिन इस बीच मुंबई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग वाली याचिका भी दाखिल कर दी गई। याचिका कांग्रेस के ही सदस्य तहसीन पूनावाला की ओर से था। मजेदार बात यह है कि जज लोया ने सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई सिर्फ पांच महीने तक की थी। 2012 से 2014 तक इस केस की सुनवाई जज जेटी उत्पत कर रहे थे, 25 जून 2015 को जिनका तबादला हो गया था। इसके बाद जज लोया को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। जज लोया की मौत की सच्चाई चाहे जो हो लेकिन विपक्ष सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड को लेकर आठ सालों से सीधे तौर पर अमित शाह और परोक्ष रूप से मोदी पर निशाना साधता रहा है। 2013 के गुजरात विधानसभा चुनाव के और 2014 के आम चुनाव के पहले सोहराबुद्दीन मुठभेड़ विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा था। लेकिन आम चुनाव के एक साल भीतर अमित शाह आरोपों से साफ बरी हो गए। जज लोया की मौत के पीछे साजिश की आशंका जताकर गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले को फिर जिंदा करने की कोशिश हुई। इसे और गरमाने की कोशिश हो रही है तो जाहिर है कि 2019 चुनाव से भी इसे जोड़ा जाएगा।



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