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पृथ्‍वी के इस रहस्‍य के बारे में जानकर आप भी रह जाएंगे दंग

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पृथ्‍वी को लेकर लगातार वैज्ञानिक वर्षों से नई-नई खोज कर रहे हैं। जिस पृथ्‍वी पर हम रहते हैं करोड़ाें वर्ष पहले उसका अस्तित्‍व कैसा था और यहां का वातावरण कैसा था। इसके अलावा इससे सुदूर ब्रह्मांड में क्‍या कुछ था और है इसको लेकर वैज्ञानिक नई-नई जानकारियां हासिल करते रहते हैं। लेकिन क्‍या आपको पता है कि इस पृथ्‍वी की उत्‍पत्ति कैसे हुई थी। नहीं जानते हैं तो चलिए आज हम आपको इसके बारे में कुछ रोचक जानकारियां देते हैं। अापको जानकर हैरानी होगी कि पृथ्वी और हमारे सौरमंडल के अन्य ग्रह कीचड़ से बने विशालकाय गोलों के रूप में पैदा हुए थे। इसका दावा वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन के आधार पर किया जा रहा है। हालांकि अब तक व्यापक रूप से यही माना जाता रहा है कि पृथ्वी और अन्य ग्रहों की उत्पत्ति चट्टानी क्षुद्रग्रहों के रूप में हुई थी। पृथ्वी के निर्माण के संबंध में नई धारणा ने पुरानी मान्यताओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कैलिफोर्निया की कर्टिन यूनिवर्सिटी के शोधकताओं ने कहा कि हमारे सौरमंडल में कई मूल खगोलीय पिंडों ने संभवत: असल में चट्टानी क्षुद्रग्रहों के रूप में जीवन की शुरुआत नहीं की। इन शोधकर्ताओं की मानें तो अध्ययन में यह पाया कि अपने आरंभ के समय पृथ्वी समेत अन्य ग्रह गर्म कीचड़ के विशालकाय गोले रहे होंगे। कर्टिन यूनिवर्सिटी के खगोलविज्ञानी फिल ब्लैंड ने छोटे ग्रहों के बारे में बेहतर जानकारी हासिल करने के लिए यह शोध किया था। छोटे ग्रहों को मौजूदा ग्रहों का आरंभिक रूप माना जाता है। यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक ब्रायन ट्रैविस का कहना है कि रेडियोसक्रिय आइसोटोप के क्षय से निकली गर्मी से बर्फ पिघल गई होगी। इस तरह निकला पानी धूल के महीण कणों में मिल गया होगा जिससे कीचड़ का विशाल गोला बना होगा, जो लंबे समय के साथ ग्रह में तब्दील हो गया। आज इस पृथ्‍वी पर जीवन है। लेकिन वैज्ञानिक इसके अलावा भी सुदूर ब्रह्मांड में ऐसे ग्रहों की खोज करने में लगे हैं जहां जीवन संभव हो और जहां पर इंसानी बस्तियां बसाई जा सकें। आपको बता दें कि जाने-माने खगोलविद प्रोफेसर स्‍टीफन हॉकिंस ने एक बार कहा था कि मानव को जल्‍द ही अपने लिए ब्रह्मांड में ऐसे नए ग्रहों की खोज पूरी करनी होगी। इसके पीछे उनका मानना यह है कि पृथ्‍वी लाख या करोड़ वर्ष बाद रहने योग्‍य नहीं होगी, लिहाजा इसका इंतजाम हमें पहले ही करना होगा। यहां पर आपको यह भी बता देना काफी दिलचस्‍प होगा कि वैज्ञानिक लगातार इस बात की भी खोज कर रहे हें कि शायद इतने बड़े ब्रह्मांड में जहां करीब सौ अरब गैलेक्‍सी हैं, जिनमें लाखों या करोड़ों तारे भी हैं, वहां हम ही केवल नहीं होंगे। वर्षों से इसको लेकर खोजबीन जारी है कि शायद हमें इस सुदूर ब्रह्मांड में कोई ओर भी मिल जाए। यही वजह थी कि वर्ष 1977 में दो वोयाजर स्पेसक्राफ्ट पर फोनोग्राफ रिकॉर्ड रख कर सुदूर ब्रह्मांड में भेजे गए थे। इनमें धरती के कुछ चुनिंदा दृश्य और आवाजें थीं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 2008 में बीटल्स के मशहूर गाने एक्रॉस दि यूनिवर्स को धरती से 430 प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारे नॉर्थ स्टार तक भेजा था। इसका मकसद था कि कोई हमें शायद सुन सके और हमसे संपर्क साधने की कोशिश करे। हम दूसरे ग्रहों पर रहने वालों को एलियन का नाम देते आए हैं। इनकी खोज में वैज्ञानिक वर्षों से लगे हुए हैं। लेकिन प्रोफेसर हॉकिंस का मानना है कि एलियन हैं तो जरूर, लेकिन इनसे संपर्क साधना खतरनाक हो सकता है। वह यह भी मानते हैं कि ब्रह्मांड में ग्रहों पर ही नहीं बल्कि तारों पर भी जीवन संभव हो सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि विशाल आकाशगंगा में छिपे हुए तारों के कारण उस तारामंडल के दूसरे ग्रह अपने वास्तविक आकार से छोटे दिखते हैं। इसके कारण पृथ्वी के समान ग्रह ढूंढ़ने के लिए चलाए जा रहे प्रोग्राम और रिसर्च अकसर इससे प्रभावित होते हैं। पृथ्वी जैसे ग्रह का पता लगाने में ग्रहों का घनत्व एक अहम कारक होता है। कम घनत्व होने से वैज्ञानिक यह संकेत पाते हैं कि ग्रह गैसों से भरा है। यह ठीक ऐसे ही होता है जैसे मौजूदा समय में बृहस्पति है। वहीं घनत्व अधिक होने का मतलब है कि ग्रह पृथ्वी जैसा चट्टानी है। लेकिन कुछ रिसर्च में यह बात सामने निकल कर आई है कि कुछ ग्रह पूर्व अनुमान से कम घनत्व के पाए गए, और ऐसा उस तारामंडल में विद्यमान एक दूसरे छिपे हुए तारे की वजह से हुआ। इस तरह की रिसर्च में कहा गया है कि नासा के केप्लर स्पेस टेलिस्कोप जैसे अत्याधुनिक वेधशालाओं द्वारा भी कई बार पास-पास अपनी कक्षाओं में चक्कर लगा रहे दो तारे तस्वीरों में प्रकाश के एक बिंदु की तरह दिखाई पड़ सकते हैं। हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के एक दल ने आकाशगंगाओं का बहुत बड़ा समूह खोजा है, जिसका आकार अरबों सूर्य के बराबर है। इसका नाम ‘सरस्वती’ रखा गया है। इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स के मुताबिक यह पृथ्वी से करीब 400 लाख प्रकाश वर्ष दूर है और करीब 10 अरब वर्ष से अधिक पुराना है।



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