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चीन की पूरी सेना के सामने खड़े थे 120 जवान, दुश्मन छू भी नहीं पाया था सरहद

नई दिल्ली: चीन के कब्जे में जम्मू-कश्मीर का लगभग 38,000 वर्गकिमी इलाका है। इसके अलावा 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान "सीमा समझौते" के तहत, पाकिस्तान ने 5,180 वर्गकिमी का भारतीय क्षेत्र (पाक अधिकृत कश्मीर) चीन को सौंप दिया था। चीन लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर के अरुणाचल प्रदेश के हिस्से पर अपना दावा करता है। भारत-चीन सीमा के बीच लगभग 2000 वर्ग किलोमीटर पर भी वह अपना दावा बताता है। दक्षिण चीन सागर विवादों के अलावा, चीन-भारत सीमा एक प्रमुख क्षेत्रीय विवाद है, जो चीन ने हल नहीं किया है। इसके अलावा वह दो अन्य जगहों पर भी अपना दावा बताता है। पहला, पश्चिमी क्षेत्र में, जम्मू और कश्मीर के लद्दाख जिले के पूर्वोत्तर भाग में स्थित अक्साई चीन पर है। दूसरा दावा, नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एंजेसी में वह अपना दावा करता है, जिसे भारत ने अरुणाचल प्रदेश का नाम दिया है और एक राज्य बनाया। भारतीय सैनिक नहीं थे तैयार 1962 में इन क्षेत्रों पर लड़ाई में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के अच्छी तरह से प्रशिक्षित और अच्छी तरह से सशस्त्र सैनिकों ने भारतीय सैनिकों को पछाड़ दिया। भारतीय सैनिक इतनी ऊंचाई पर लड़ने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे और न ही उनके पास जरूरी हथियार थे। मगर, 120 बहादुर भारतीय जवानों की वजह से चीन आगे नहीं बढ़ पाया। अगर, ये जवान नहीं होते, तो चीनी सैनिक भारतीय सीमा में काफी अंदर तक घुस आए होते। इन 120 जवानों ने 1300 से अधिक चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारकर चीन के हौंसले पस्त कर दिए थे। ऐसा उन्होंने तब किया था, जब उनके पास पर्याप्त हथियार और पहाड़ों पर लड़ने का प्रशिक्षण नहीं था। अपने बुलंद हौसलों से उन्होंने आखिरी सांस तक दुश्मन को सरहद छूने तक नहीं दी थी। क्या हुआ था उस दिन 18 नवंबर 1962 को लद्दाख में चुशुल के बर्फ से ढंके पहाड़ों पर जंग छिड़ी। इसे आज भी सशस्त्र बलों के इतिहास में सबसे बड़ा युद्ध माना जाता है। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13 कुमाऊं के 120 जवानों की चार्ली कंपनी चुशुल एयरफिल्ड की रक्षा कर रही थी। यदि भारत को लद्दाख पर कब्जा बनाए रखना था, तो इस जगह को बचाए रखना बेहद अहम था। पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) के 5000 से 6000 सैनिकों ने सुबह 03:30 बजे चुशुल एयर फील्ड पर हमला किया। वे सभी भारी हथियारों और गोला-बारूद के साथ पूरी तैयारी से आए थे। भारत के लिए स्थिति बेहद खराब थी क्योंकि ऊंची चोटी तक पहुंचने की व्यवस्था नहीं होने के कारण भारतीय सैनिकों तक तोपखाने की मदद नहीं पहुंचाई जा सकी थी। जवानों को खुद ही लड़ने के लिए छोड़ दिया गया था। कप्तान रामचंद्र यादव, उन 120 भारतीय सैनिकों में से एक थे, जो इस जंग में लड़े थे। इनमें से महज छह ही जिंदा बचे थे, जिन्हें चीन युद्धबंदी बनाकर ले गया था। हालांकि, जल्द ही उन्हें चमत्कारिक रूप से बचा लिया गया। आज भी इनमें से महज चार लोग जिंदा है। यादव ने बताया कि लड़ाई शुरू होते ही भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद जल्द समाप्त हो गया और उन्होंने नंगे हाथों से लड़ना पड़ा। चीन को चबाने पड़े लोहे के चने इतनी कम सेना आम-तौर पर पीछे हट जाती है। मगर, मेजर शैतान सिंह की अगुवाई वाली कंपनी आखिरी गोली, आखिरी जवान और आखिरी सांस तक लड़ी। 120 बहादुर 120 भारतीय सैनिकों ने 1,300 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराया। वे दुश्मन के ही गोला-बारूद को लेकर लड़ते। बिना हथियारों के शेरों की तरह इन सच्चे नायकों ने अदम्य साहस दिखाया। हालांकि, चीन से भारत हार गया था, लेकिन इन वीरों का साहस अमर हो गया। चीन को इस लड़ाई में लोहे के चने चबाने पड़े थे। मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत कंपनी की अगुवाई करने के लिए परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी वीरता को कल्पना से परे है। वे जानते थे कि यह हारी हुई लड़ाई है, लेकिन आत्मसमर्पण करने के बजाये उन्होंने अद्वितीय वीरता दिखाई। उनकी कंपनी को पांच वीर चक्र दिए गए। वे आखिरी समय तक लड़े और जब गोला बारूद खत्म हो गया, तो उन्होंने नंगे हाथों से लड़ाई लड़ी।



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