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ड्रैगन के चंगुल में फंसे हैं भारत के पड़ोसी, बन सकते हैं परेशानी का सबब

भारत के लिए चीन शुरू से ही परेशानी खड़ा करता रहा है। चीन का मकसद शुरु से ही भारत के खिलाफ योजनाएं बनाने का रहा है। इसी सीरीज में वह लगातार भारत को घेरने में लगा हुआ है। मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो चीन भारत को घेरने की नीयत से पहले नेपाल, बांग्‍लादेश, श्रीलंका और पाकिस्‍तान को अपने चंगुल में फंसा चुका है। दरअसल इसके लिए चीन ने जो पासा फेंका है उससे यह तमाम देश निकल नहीं पाए और आने वाले भविष्‍य में इनका इस चंगुल से निकलना लगभग असंभव दिखाई देता है। आर्थिक मदद का झांसा दिखाकर चीन इन सभी देशों को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। हालांकि यह भारत के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। चीन की गिरफ्त में नेपाल बीते कुछ वर्षों में भारत-चीन संबंधों में जिस तरह की गरमाहट दिखाई देनी चाहिए थी वह कुछ कम रह गई। इसका पूरा फायदा चीन ने अपनी ही तरह से उठाया। इसके तहत पिछले वर्ष 15 वर्षों में पहली बार चीन के रक्षा मंत्री ने नेपाल की जमीन पर कदम रखा। उनका यह कदम सिर्फ नेपाल की सहायता और राजनीतिक रिश्‍तों को बढ़ाने तक सीमित नहीं था बल्कि इसके पीछे मकसद था नेपाल को भारत के प्रति भड़काना, आर्थिक मदद का लालच देकर अपने साथ मिलाना। आपको यहां बता देना जरूरी होगा कि भारत की ओर से नेपाल को दी जाने वाली मदद बीते पांच सालों में घटकर लगभग आधी यानी 2.2 करोड़ डॉलर रह गई है जबकि इसी दौरान उसे चीन से मिलने वाली मदद दोगुनी हुई है। नेपाल के विकास निगम की रिपोर्ट के अनुसार 2014-2015 की 12 महीनों की अवधि में उसे 3.794 करोड़ डॉलर की चीनी मदद वितरित की गई। इससे चीन नेपाल का चौथा सबसे बड़ा द्विपक्षीय दाता बन गया। उससे पहले ब्रिटेन, अमेरिका और जापान हैं। वहीं स्विट्जरलैंड उसके लिए पांचवा सबसे बड़ा दाता है। नेपाल पर चीनी नजर अब जरा एक नजर चीन द्वारा नेपाल को किए गए वादे और इरादे पर भी डाल लेते हैं। चीन का इरादा तिब्बत की राजधानी ल्हासा से नेपाल की राजधानी काठमांडू तक रेल लाइन बिछाने का भी है। इसको लेकर चीन पूर्व में नेपाल सरकार को इससे अवगत करा चुका है। यहां पर यह बात भी ध्‍यान में रखने वाली है कि ल्‍हासा रेलवे लाइन का विस्‍तार आगे गैरांग तक है जो कि एक बंदरगाह होने के साथ साथ नेपाल की तीनों सेनाओं का एक बड़ा केंद्र है। इतना ही नहीं नेपाल में बीते समय जिस तरह का संकट देखा गया था उसमें भी चीन एक मददगार के तौर पर उभरा था। उस वक्‍त भारत की नाकेबंदी का जवाब देने के लिए चीन ने नेपाल को कई जरूरी चीजें मुहैया करवाई थीं। श्रीलंका पर चीन का दांव जिस आर्थिक मदद का खेल चीन ने नेपाल के साथ खेला वही खेल उसने श्रीलंका के साथ भी खेला। इसका नतीजा यह हुआ कि श्रीलंका सरकार को हंबनटोटा बंदरगाह को 99 वर्षों के लिए लीज पर चीन को सौंपना पड़ा। इस बंदरगाह को विकसित करने में चीन का हाथ था। इसके पीछे चीन का मकसद भारतीय हितों को हिंद महासागर में नुकसान पहुंचाना है। अब चाइना मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स कंपनी द्वारा प्रबंधित हंबनटोटा इंटरनेशनल पोर्ट ग्रुप और हंबनटोटा इंटरनैशनल पोर्ट सर्विसेज के साथ श्री लंका पोर्ट्स अथॉरिटी इस बंदरगाह और इसके आसपास के निवेश क्षेत्र को नियंत्रित करेंगे। श्रीलंका को चीन की आर्थिक मदद आपको बता दें कि श्री लंका पर चीन का 8 अरब डॉलर कर्ज है। जिसको धीरे-धीरे चुकाने के मकसद से श्रीलंका की सरकार ने यह कदम उठाया है। यहां पर यह भी बता देना जरूरी है कि 2005 से 2012 के दौरान चीन की तरफ से श्रीलंका को करीब 4.761 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद दी गई थी। इसके अलावा 2012-2014 में भी चीन ने श्रीलंका को 2.18 बिलियन डॉलर की अतिरिक्त सहायता दी थी। मौजूदा समय में चीन श्रीलंका को आर्थिक मदद देने वाले बड़े देशों में शुमार है। यहां तक ही उसने जापान को भी पीछे छोड़ दिया है। चीन के चंगुल में पाकिस्‍तान चीन और पाकिस्‍तान के संबंध किसी से अछूते नहीं रहे हैं। आलम यह है कि अब अमेरिका से रिश्‍तों में खटास आने की एक वजह पाकिस्‍तान की चीन से करीबी भी है। बहरहाल पाकिस्‍तान को चीन अपने चंगुल में इस कदर फंसा चुका है कि उसका निकलना लगभग नामुकिन है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन की एक बहुत बड़ी वाणिज्यिक परियोजना है। इसका मकसद दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान से चीन के उत्तर-पश्चिमी स्वायत्त क्षेत्र शिंजियांग तक ग्वादर बंदरगाह, रेलवे और हाइवे के माध्यम से तेल और गैस की कम समय में वितरण करना है। 2442 किलोमीटर लंबा है गलियारा आर्थिक गलियारा चीन-पाक संबंधों में केंद्रीय महत्व रखता है, गलियारा ग्वादर से काशगर तक लगभग 2442 किलोमीटर लंबा है। इस योजना पर 46 बिलियन डॉलर लागत का अनुमान लगाया गया है। इसके जरिए ग्वादर बंदरगाह से 19 मिलियन टन कच्चे तेल को चीन तक सीधे भेजा जा सकेगा। यह डील सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि इसके तहत चीन पाकिस्‍तान को सबमरीन भी सौंपेगा। इस सौदे के जरिए चीन ने तीन तरफा पासा फैंका है। इसमें से एक है अपना आर्थिक विकास, दूसरा है भारत की धेराबंदी और तीसरा है पाकिस्‍तान की जमीन का अपने लिए इस्‍तेमाल । बांग्‍लादेश में 30 वर्ष बाद चीन के राष्‍ट्रपति भारत को घेरने की जुगत में चीन ने भारत के पड़ोसी बांग्‍लोदश को भी अपनी आर्थिक मदद की चाल में फंसा लिया है। आपको बता दें कि पिछले वर्ष चीन के राष्‍ट्रपति शी चिनफिंग ने बांग्‍लादेश की यात्रा की थी। बीते 30 वर्षों में यह पहला मौका था जब चीनी राष्‍ट्रपति बांग्‍लादेश पहुंचे हों। इस दौरान करीब 24 अरब अमेरिकी डॉलर से भी ज़्यादा रकम के कर्जों को हरी झंडी दी गई। जिसके बाद बांग्‍लादेश को कर्ज देने वालों की सूची में चीन सबसे ऊपर आ गया है। चीन ने दिखाया विकास का सपना यहां पर चीन ने बांग्‍लादेश को ऊर्जा संयंत्र व बंदरगाह और रेलवे में का सपना दिखाया है। यहां यह भी बता देना जरूरी होगा कि भारत भी बांग्‍लादेश में अपना निवेश बढ़ा रहा है लेकिन जिस तेजी से चीन वहां पर अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहा है उसमें भारत पिछड़ रहा है। गौरतलब है कि चीन के बाद बांग्लादेश दुनिया में कपड़ा बनाने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। बांग्लादेश को इससे सालाना 28 अरब डॉलर मिलते हैं और ये देश के निर्यात का 80 फीसदी है।



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