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नए दौर में विकास की नई रीति-नीति

नई दिल्ली:इस बार का 15 अगस्त कई मायनों में तूफान के बाद एक तरह की शांति का बोध देता हुआ लगा, तो अचरज नहीं। अलबत्ता, इस शांति में कितना चैन है और कितना भविष्य की चुनौतियों को लेकर चिंता, इस पर फिलहाल हम नहीं जाएगे। किंतु जब हमारे अभिभावकों की पीढ़ी के सामने पं. नेहरू ने रावी तट पर तिरंगा फहराते हुए भारत में लोकतांत्रिक राजनीति के पहले चक्र की शुरुआत की, तब भी (उस वक्त का लिखित इतिहास व साहित्य गवाही देते हैं) आजादी की खुशी और विभाजन की त्रासदी को लेकर गहरे उल्लास और उतने ही गहरे विषाद का मिला-जुला माहौल देश में मौजूद था। बदलाव का वह पहला चक्र 1991 तक चला, जब नरसिंहराव सरकार के वित्तमंत्री के बतौर डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत को नेहरूयुगीन लाइसेंस कोटा परमिट से युक्त समाजवाद से मुक्त किया और पूंजीवादी उदारीकरण को अगले वर्षों के लिए विकास का आधार बनाया। यह आर्थिक प्रयोग जारी रह सकता था अगर भारत का निरंतर आपसी राग-द्वेष तथा परिवारवाद से उलझता राजनीतिक इलीट उसे उसकी सहज परिणति पाने देता। किंतु वह नहीं हुआ। 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन उनकी निर्णय लेने की क्षमता और राजनीतिक हैसियत (अपने वित्तमंत्रित्वकाल से भी) बहुत कम होती चली गई। वित्तमंत्री के बतौर मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों और उसके बाद आए मंडल और कमंडल नामक दो बडे भूकंपों के मिले-जुले असर ने न केवल उपभोक्ता उन्मुख विकास के खाके को नई स्वीकृति दिलवा दी, उसने व्यापार और बाहरी पूंजी निवेश की बड़ी राहें खोलकर अर्थजगत में निजी उपक्रमों और समाज में मुक्त उपभोक्तावाद को हर तरह से बढ़ावा दिया। स्पर्धा बढ़ी तो चैन से जुगाली करते रहे सार्वजनिक क्षेत्र की अवध्यता भी खत्म हो गई और (एयर इंडिया की तरह) अब खुले बाजार की सक्रिय स्पर्धा में फिसड्डी रहने पर निजी या सार्वजनिक कंपनियों का दिवालिया होकर बिकने का रास्ता भी नए कानूनों ने आसान कर दिया है। यह स्वस्थ है। पर विचारणीय यह भी है कि यह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा पहलू वह है जो हमको शेष विश्व से जोड़ता है। भारत के अलावा शेष दुनिया भी बहुत बदली है। यहां अब लगातार नए सत्ता ध्रुव और नए आर्थिक, कूटनीतिक गठजोड़ बन-बिगड़ रहे हैं। राजकीय सीमाएं लचीली होने से बेपनाह पूंजी दिन-रात सारी दुनिया में संचरण कर रही है और पूर्व से पश्चिम तक चाहे-अनचाहे शेयर मार्केट सियामी जुड़वाओं की तरह ऐसे गुंथ गए हैं कि बीजिंग या हांगकांग को छींक आने से सारे अमेरिका, योरप को नजला हो जाता है। अपनी सत्ता के स्वर्णयुग की शुरुआत में, जाहिर है भाजपा को भी इस बहुमुखी और चलायमान माहौल में विकास की अपनी नई परिभाषाओं और गहरे बदलावों का आगाज करना होगा। वह नए-नए विशेषज्ञों को लाकर, नए सिरे से संस्थाओं का पुनर्गठन कर रही है ताकि उनकी मदद से नए रोडमैप बनाकर भविष्य के लिए जमीन तैयार की जा सके। ऐतिहासिक नजरिए से यह उचित और प्रत्याशित दोनों है। पर हम सब जानते हैं कि लोकतांत्रिक राजनीति में आर्थिक पटल के अलावा कई और सामाजिक व राजनीतिक अंधड़ों के यकायक विमोचित हो जाने का अंदेशा लगातार बना रहता है। सो नीतियां चाहे जितनी भी सुघड़ाई से बनें, उनके अंतिम फल राजनीति, अर्थनीति, सामाजिक और सांस्कृतिक हलचलों के संयुक्त मंथन से ही निकलते हैं। कुछ दिन पूर्व मनमोहन युगीन नीतियों तले बदलते गए भारत पर प्रकाशित एक महत्वपूर्ण लेख संकलन के विमोचन के मौके पर यह तमाम सवाल उपस्थित शीर्ष विद्वानों के आगे उभरे। उनके अधिकतर वक्तव्यों का सार यही था कि भारत आज एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है जहां पिछले 70 बरसों में लोकतंत्र के मंथन से निकले कई नए-नए वर्ग लगातार अधिक मुखर तथा उत्कट आग्रही आलोचक बनकर हर सरकार से उद्दंड स्वरों में पूछने लगे हैं कि देश में अमीर अधिक अमीर और गरीब (खासकर किसान व मजदूर) अधिक गरीब क्यों हो रहे हैं? असंगठित, अर्धसाक्षर, दलित-आदिवासी और महिलाओं के लिए नौकरियां क्यों कम होती जा रही हैं? आरक्षण की जद क्यों नहीं बढ़ाई जा सकती? सवाल भले कड़वे हों, शीर्ष नेतृत्व को उनमें निहित नए सामूहिक हित-स्वार्थों को पूरी गंभीरता से लेते हुए अपने नए विकास-खाके बनाने होंगे। अब जब जनता ने बड़ी तादाद में कांग्रेस व अन्य दलों के खिलाफ मत देकर भाजपा को एकमुश्त राजकाज सौंप दिया है, तो वे यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि अमीर ही अमीर होते रहें, शेष भारत उसी तरह विपन्न् बना रहे। व शीर्ष पर सत्ता की रेवड़ियां फिर उसी तरह बंटने लगें जैसे कांग्रेस के अंतिम वर्षों में बांटी जा रही थीं। एक बहुत मार्के का सवाल अशोक विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रतापभानु मेहता ने अर्थशास्त्रियों से पूछा। देश के विकास के तमाम खाके बनाते समय याद रखना जरूरी है कि अर्थजगत के समीकरण बिठाना ही काफी नहीं। एक लोकतंत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना की भी विकास का खाका बनवाने में अहम भूमिका होनी चाहिए, क्योंकि अंतत: सभी कागजी खाके अपना जमीनी रूप समाज के ही बीच पाते हैं। फिलवक्त राज-समाज तथा बाजार ही नहीं, लोकतंत्र के सभी पायों की जो संरचना है, उन सबमें शीर्ष से तलहटी तक पुरुषों का ही वर्चस्व है। और भले ही शहरी पढ़े-लिखे वर्ग की कुछ महिलायें पुरुष वर्चस्व के क्षेत्रों में तरक्की करती दिखें, आज तक हमारी विकासपरक योजनाएं लगभग पूरी तरह से पुरुषों के दृष्टिकोण से ही बनती व लागू होती रही हैं। इस एकांगी खाके से जो विकास के काम हुए (बांध, सड़क-भवन निर्माण), नए रोजगारों का सृजन हुआ, सकल राष्ट्रीय आय बढ़ी, उनके फायदे (कुछेक अपवाद छोड दें तो), शहरी समृद्धजनों, शहरी उपक्रमों और उनमें काबिज पुरुषों के ही खाते में पड़े हैं। महिलाओं का विकास के असली सुफलों से कोई रिश्ता बना नहीं दिखता। प्रमाण यह कि कन्या भ्रूणहत्या या बलात्कार निरोधी कानूनों के बावजूद हम महिला व सामाजिक विकास के सभी विश्व सूचकांकों की बहुत निचली पायदानों पर खड़े हैं। उधर पर्यावरण, खेती, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य के जन-जन से जुड़े क्षेत्र भी पूंजीवादी विकास की नई प्राथमिकता सूची से गैरहाजिर रहने के कारण आज मरणासन्न् हैं। जरूरी है कि अब नई नीतियों के बनाने वाले सिर्फ आयातित विकास के आर्थिक मुहावरों के जाप को त्यागकर दृष्टि गांवों, वंचित वर्गों, शिक्षा तथा स्वास्थ्य कल्याण की तरफ फिराएं। बना-बनाया विकास का मॉडल पकड़कर अपनी आधी आबादी के जो कीमती, अनुभवजन्य जमीनी विचार हमने गए सालों में लगातार त्यागे हैं, उनको समाहित किए बिना हम अंतत: उसी अलोकतांत्रिक, इकहरे और वर्ग विशेष तक सीमित विकास की तरफ ही दोबारा कदम बढ़ाएंगे।



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