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दुनिया के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इस बैंक पर भी अब मंडरा रहा खतरा

नई दिल्‍ली : जब से सृष्टि बनी है तभी से पेड़-पौधे और जीव जंतु भी अस्तित्‍व में हैं। लेकिन इंसान ने इन सभी पर काबू पाने के लिए जो तबाही मचाई है वह भी किसी से अछूती नहीं है। आलम यह हो गया जो धरती इंसान के रहने के लिए रची बसी थी अब उसने उस धरती के लिए ही संकट खड़ा कर दिया है। यह संकट कुछ वर्षों के दौरान नहीं आया है बल्कि इंसान ने इतने वर्षों में प्रकृति का जो शोषण किया है उसकी वजह से आज इस पृथ्‍वी पर संकट आ गया है। इसका सबसे बुरा प्रभाव अब दिखाई देना भी शुरू हो गया है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने जिस चीज को बुरे वक्‍त के लिए धरती के गर्भ में संजोकर रखा था उस पर भी अब इसकी नजर लग गई है। धरती को हरा-भरा रखने की कोशिश आपको अब भी इस बात का अहसास नहीं हुआ है कि हम यहां पर किसकी बात कर रहे हैं। तो चलिए आपको बताते हैं क्‍या है पूरा माजरा। दरअसल वैज्ञानिकों ने पृथ्‍वी पर आने वाले संकट को भांपकर इस धरती पर उगने वाले हर पेड़ पौधे के बीज को संजोकर रखने के लिए एक योजना बनाई थी। इस योजना को सीड वॉल्‍ट के नाम से साकार किया गया। सीड वॉल्‍ट में ही इस धरती पर दिखाई देने वाले हर पेड़ पौधे और फसलों  के उत्‍तम श्रेणी  के बीज संरक्षित हैं। इसके पीछे वैज्ञानिकों की सोच थी कि यदि पृथ्‍वी पर कोई ऐसा संकट आया जिसकी वजह से कहीं पेड़ पौधों की प्रजातियां विलुप्‍त या नष्‍ट हो गईं तो से में यहां से बीज निकालकर उन वनस्‍पतियों को दोबारा उगाया जा सकेगा। इस सीड वॉल्‍ट में हर तरह के बीज को काफी मात्रा में संजोकर रखा गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बीज बैंक हैं। प्राकृतिक आपदा या युद्ध से नष्‍ट होते पेड़ पौधे यूं तो दुनिया के लगभग हर देश में बीज बैंक होते हैं लेकिन इनका मकसद अपने तक ही सीमित होता है। यह सीड वॉल्‍ट इंसानी आबादी से बहुत दूर बर्फ की चट्टानों के बीच और जमीन के नीचे बनाया गया है। इसका मकसद यह है कि यदि भविष्‍य में पृथ्‍वी पर कभी तबाही आई तो दुनिया भर के पेड़ पौधों और खाद्यान्‍न को उगाने के लिए फिर मशक्‍कत न करनी पड़े। इस बैंक का मकसद भविष्‍य के लिए आज की धरोहर को संजोना कहा जा सकता है। अक्‍सर भीषण युद्ध के दौरान और भीषण प्राकृतिक आपदा के दौरान कई तरह की वनस्‍पति नष्‍ट हो जाती है। ऐसी संकट की घड़ी में यह बीज काम आ सकेंगे। सीड वॉल्‍ट के लिए चुना गया बेहद ठंडा इलाका इस बैंक को बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया के बेहद ठंडे इलाके नार्थ पॉल को चुना। जिस जगह यह स्‍वालबार्ड ग्‍लोबल सीड वॉल्‍ट बनाया गया है वह दरअसल नार्थ पॉल और नॉर्वे के बीच की ही जगह है। यह बैंक हमारी सोच से भी कहीं अधिक विशाल है। इस जगह को इसलिए वैज्ञानिकों ने चुना है क्‍योंकि उन्‍हें उम्‍मीद है कि यहां पर आसानी से प्राकृतिक आपदा नहीं आएगी और न ही इसको युद्ध का कोई संकट घेरेगा। इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि यहां के बर्फीले मौसम में बीज को लंबे समय तक के लिये बचा कर रखा जा सकता है। वहीं यदि किसी अन्‍य जगह पर यह बनाया गया होता तो इस पर काफी खर्च आता। यहां पर कोई मानवीय संकट न आए इसके लिए इस पूरे इलाके को ही 'नो वार जोन' घोषित किया गया है। इसके लिए बाकायदा कई देशों के बीच आपसी समझौता हुआ है। बर्फ की चट्टानों की गहराई में है यह बैंक यह सीड वॉल्ट बर्फको की चट्टानों को काटकर बहुत गहराई में अंदर तक बनाया गया है। इसमें हर तरह  की किस्म के लाखों बीज रखे हैं। दुनिया का कोई पेड़-पौधा ऐसा नहीं बचा है, जिसका बीज यहां पर मौजूद न हो। यह बैंक किसी तरह की विपदा आने पर उस देश को बीज देने में किसी तरह की वसूली नहीं करता है। यह इस पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिये ही किया जा रहा है। भले ही बीते दौर में पृथ्वी से डायनासोर और उस दौर की चीजें लुप्त हो गईं हो लेकिन उम्‍मीद की जाती है कि वैज्ञानिकों के इस प्रयास से हमारी पृथ्‍वी पर कभी हरियाली खत्‍म नहीं होगी। 2008 में बना था सीड वॉल्‍ट वर्ष 2008 में वैज्ञानिकों ने इस बैंक को बनाया था। इसमें दुनियाभर में पाए जाने वाले सबसे खास और बेहतरीन गुणवत्ता वाले अनाजों, फलों, सब्जियों और पेड़-पौधों के चुनिंदा बीज संभाल कर रखे गए है। इसलिए ही इसको 'ग्लोबल सीड वॉल्ट' का नाम दिया गया है। इस सीड वॉल्ट को हर तरह के खतरे का सामना करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया था। शायद इसलिए कई लोग इसे 'डूम्सडे सीड वॉल्ट' भी कहते हैं।  इसका डिजाइन अभेद्य है। पूरी मानवता के भविष्य को बचाने के मकसद से तैयार किए गए इस सीड वॉल्ट को एक बर्फीले पहाड़ के अंदर काफी गहराई में बनाया गया था। इस पूरी मेहनत पर ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बढ़ते तापमान ने पानी फेर दिया है। इसके कारण यहां पूरी सर्दियों में यहां का तापमान बेहद गर्म रहा। यहां के वातावरण में अजीबोगरीब बदलाव देखने को मिले। इसके कारण बहुत बड़ी मात्रा में बर्फ पिघली और सीड वॉल्‍ट प्रवेश करने की सुरंग में पानी भर गया। अच्छी बात यह रही कि सुरंग में भरा पानी अंदर वॉल्ट तक नहीं पहुंच सका और वहां रखे बीज सुरक्षित बच गए। बीजों के हैं दस लाख पैकेट्स इसके अंदर बीजों के करीब 10 लाख पैकेट्स हैं। हर पैकेट में एक अहम फसल श्रृंखला से जुड़े बीज सुरक्षित रखे गए हैं। जब 2008 में इसे बनाया गया था, तब बर्फ से जमी जमीन के अंदर काफी गहराई में इस वॉल्ट को डूबो दिया गया था। माना जा रहा था कि यह व्यवस्था किसी भी मानवीय या प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इस वॉल्ट को शर्तिया सुरक्षित रखेगी। लेकिन गुजरा साल आर्कटिक में अब तक का सबसे गर्म साल रहा। यहां का तापमान तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसके कारण बड़ी मात्रा में बर्फ पिघली और मूसलाधार बारिश हुई। मुहाने तक पहुंच गया पानी नॉर्वे सरकार ने एक बयान जारी कर कहा कि यह कभी नहीं सोचा था कि यह सीड वॉल्ट के लिए ऐसे दिन भी देखने को मिलेंगे। जलवायु में हुए इस बदलाव के कारण जो तब्दीलियां हुईं, उसके कारण वॉल्ट की सुरंग के रास्ते में बहुत सारा पानी भर गया। इसके बाद पानी जमकर बर्फ बन गया जिससे वॉल्ट के सुरंग की हालत ग्लैशियर जैसी हो गई। फिलहाल ये बीज भले ही सुरक्षित हों, लेकिन इस पूरे मामले ने वॉल्ट की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया था कि इसपर नजर रखने की जरूरत न पड़े, लेकिन इस घटना के बाद अब इसपर चौबीस घंटे नजर रखनी पड़ रही है। यह सवाल भी वैज्ञानिकों को परेशान कर रहा है कि क्या यह वॉल्ट अपने मकसद में कामयाब होगा? क्या यह वॉल्ट संभावित विपदा की स्थिति का सामना कर सकेगा? उपाय तलाशने में जुटे वैज्ञानिक वैज्ञानिक अब इन चुनौतियों के मद्देनजर वॉल्ट की सुरक्षा के और अभेद्य उपाय तलाशने में जुट गए हैं। वैज्ञानिक इस बात पर भी नजर रखेंगे कि क्या 2017 की सर्दियां भी पिछले साल की तरह गर्म होंगी? यह सवाल भी उन्हें परेशान कर रहा है कि क्या आने वाले दिनों में स्थिति और बदतर हो जाएगी? वैज्ञानिक इस बात से परेशान हैं कि जो वॉल्ट हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित बचे रहने को तैयार किया गया था, उसे 10 साल के अंदर ही इतनी गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है। उन्हें यकीन है कि वे चुनौतियों का रास्ता तलाश लेंगे। नॉर्वे की सरकार भी इसे बहुत बड़ी जिम्मेदारी मानकर इसे काफी गंभीरता से ले रही है। आखिरकार यह कोई साधारण प्रॉजेक्ट नहीं, दुनिया और इसमें रह रहे इंसानों के भविष्य की उम्मीद है। लगातार बढ़ रहा धरती का तापमान उद्योगों और शहरी जीवन शैली की वजह से होने वाला कार्बन उत्सर्जन ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा कर रहा है जिससे धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि इसी गरमी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है और बाढ़, चक्रवाती तूफान और सूखे जैसी घटनाएं लगातार हो रही हैं। दरअसल वैज्ञानिक  वर्ष1850 के तापमान को मूल पैमाना मानते हैं। जब से औद्योगिक क्रांति शुरू हुई लेकिन धरती का तापमान 1.2 डिग्री बढ़ चुका है। वहीं अब कोशिश यह की जा रही है कि किसी भी सूरत में धरती का तापमान 1.5 डिग्री से अधिक न बढ़ सके।



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