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तो कुछ इस तरह चीन और पाकिस्तान को काबू में कर सकता है भारत

नई दिल्ली: भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच तनाव ऐतिहासिक है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद अमेरिका और रूस की अगुवाई में दुनिया दो गुटों में बंट गई। लेकिन भारत ने निर्गुट रहना पसंद किया। 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से भारत आजाद हुआ लेकिन एक कड़वा सच ये भी था कि अब वो भी दो हिस्सों में बंट चुका था। दुनिया के नक्शे पर पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान के नाम से एक नए राष्ट्र का उदय हुआ। लेकिन बहुत जल्द ही पाकिस्तान के नीति नियंताओं को एहसास होने लगा कि भारत का जो हिस्सा उनके कब्जे में आया वो सड़ा-गला निकला। पाकिस्तान के हुक्मरानों को बंटवारे का तरीका नागवार गुजरने लगा और उन्होंने नफरत का ऐसा बीज बोया जिसका असर 1948 और 1965 की लड़ाई में देखने को मिला। अपनी करारी हार से परेशान पाकिस्तान ने 1971 में एक और लड़ाई लड़ी जिसमें उसका आधा वजूद समाप्त हो गया। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पाकिस्तान अब भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा। इसके साथ ही 1950 से 1962 के दौरान भारत की तरक्की और मैक्मोहन रेखा से उपजे नए भौगोलिक नक्शे ने चीन को भी परेशानी में डाल दिया। ऐसे में चीन को एक ऐसे साझीदार की जरूरत थी जो भारत की घेरेबंदी कर सके। पाकिस्तान के रूप में चीन को एक ऐसा मोहरा मिला जिसका इस्तेमाल वो बार बार करता है। लेकिन अब चाबहार के तौर पर भारत को एक ऐसा हथियार मिला है जिससे वो चीन और पाकिस्तान का मुकाबला कर सकता है।   कहां है चाबहार ? चाबहार ईरान का सबसे दक्षिणी शहर है। ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित ये शहर एक मुक्त बंदरगाह है। इस शहर की जनसंख्या करीब 80 हजार और अधिकांश लोग बलूची भाषा बोलते हैं। मई 2015 में भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास हेतु द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये हैं। यह बंदरगाह ईरान के लिए रणनीति की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से भारत के लिए समुद्री सड़क मार्ग से अफगानिस्तान पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा और इस स्थान तक पहुँचने के लिए पाकिस्तान के रास्ते की आवश्यकता नहीं होगी। चाबहार के जरिए पाकिस्तान-चीन पर नकेल 1. चाबहार के जरिए भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान को बाइपास करके अफगानिस्तान के लिए रास्ता बनाएगा। यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि अफगानिस्तान की कोई भी सीमा समुद्र से नहीं‍ मिलती और भारत के साथ इस मुल्क के सुरक्षा संबंध और आर्थिक हित हैं। 2. फारस की खाड़ी के बाहर बसे इस बंदरगाह तक भारत के पश्चिमी समुद्री तट से पहुंचना आसान है। इस बंदरगाह के जरिये भारतीय सामानों के ट्रांसपोर्ट का खर्च और समय एक तिहाई कम हो जाएगा। 3. ईरान मध्य एशि‍या में और हिंद महासागर के उत्तरी हिस्से में बसे बाजारों तक आवागमन आसान बनाने के लिए चाबहार पोर्ट को एक ट्रांजिट हब के तौर पर विकसित करने की योजना बना रहा है। 4. अरब सागर में पाकिस्तान ने ग्वादर पोर्ट के विकास के जरिए चीन को भारत के खिलाफ बड़ा सामरिक ठिकाना मुहैया कराया है, लिहाजा चाबहार पोर्ट को विकसित करते ही भारत को अफगानिस्तान और ईरान के लिए समुद्री रास्ते से व्यापार-कारोबार बढ़ाने का मौका मिलेगा। 5. सामरिक नजरिये से भी पाकिस्तान और चीन को करारा जवाब मिल सकेगा क्योंकि चाबहार से ग्वादर की दूरी महज 60 मील है। 6. भारत उन देशों में से एक है जिसके ईरान से अच्छे व्यापारिक रिश्ते रहे हैं. चीन के बाद भारत ईरान के तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। 7. चाबहार से ईरान के मौजूदा रोड नेटवर्क को अफगानिस्तान में जरांज तक जोड़ा जा सकता है जो बंदरगाह से 883 किलोमीटर दूर है। 8. 2009 में भारत द्वारा बनाए गए जरांज-डेलारम रोड के जरिये अफगानिस्तान के गारलैंड हाइवे तक आवागमन आसान हो जाएगा। 9. इस हाइवे से अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों  हेरात, कंधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ तक सड़क के जरिये पहुंचना आसान होता है। 10. चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के पहले चरण में भारत 200 मिलियन डॉलर से अधि‍क का निवेश कर रहा है। इसमें फरवरी 2016 में दिया गया 150 मिलियन डॉलर भी शामिल है। भारत इस प्रोजेक्ट पर 500 मिलियन डॉलर निवेश करने का फैसला किया है। कहां है ग्वादर पोर्ट ? पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के तटीय कस्बे ग्वादर और इसके आसपास के इलाके को 1958 में पाकिस्तान सरकार ने ओमान से खरीदा था। इस तटीय क्षेत्र के एक बड़े बंदरगाह बनने की संभावनाओं की बात उस समय शुरू हुई जब 1954 में एक अमरीकी भूगर्भ सर्वेक्षण में ग्वादर को डीप सी पोर्ट के लिए एक बेहतरीन स्थान बताया गया। तब से ग्वादर को बंदरगाह के रूप में विकसित करने की बातें तो होती रहीं लेकिन ज़मीन पर काम दशकों बाद साल 2002 में शुरू हुआ। उस वक्त सेना अध्यक्ष रहे जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने ग्वादर बंदरगाह के निर्माण कार्य का उद्घाटन किया था और 24 करोड़ डॉलर की लागत से यह परियोजना 2007 में पूरी हुई।सरकार ने इस नए बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर की एक कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नीलामी के बाद दिया। पाक सरकार ने इस नए बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर की एक कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नीलामी के बाद दिया। ग्वादर बंदरगाह पहली बार विवाद और संदेह की चपेट में तब आया जब 2013 में पाकिस्तान सरकार ने इस बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर की कंपनी से लेकर एक चीनी कंपनी के हवाले कर दिया।जानकार इस मामले की पारदर्शिता पर आज भी सवाल उठाते हैं। यह वह दौर था जब पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर चीनी निवेश की बातें सामने आने लगीं। इसी दौरान नवाज शरीफ के नेतृत्व में बनने वाली सरकार ने घोषणा की कि चीनी सरकार ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर के निवेश का इरादा जताया है।इस परियोजना को चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर का नाम दिया गया है जिसके तहत चीन को ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने की योजना है। इस समझौते पर 2015 में हस्ताक्षर हुआ और तब पता चला कि इस परियोजना में सड़कें, रेलवे और बिजली परियोजनाओं के अलावा कई विकास परियोजनाएं शामिल हैं। चाबहार समझौते पर भारत-ईरान ने क्या कहा था ? चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए ईरान के साथ हुए समझौते पर भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हम इतिहास बनते देख रहे हैं। ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा था कि इस बंदरगाह के विकास से पर्यटन के साथ-साथ सामरिक तौर पर भारत, ईरान और अफगानिस्तान के दूसरे के करीब आएंगे। विशेषज्ञों की राय जानकारों का कहना है कि हिंद महासागर न केवल आर्थिक संसाधनों के लिए बल्कि सामरिक तौर से महत्वपूर्ण है। जिस तरह से भूगर्भीय संसाधनों का दोहन हो रहा है वो आने वाली कुछ शताब्दियों में खत्म हो जाएगा। ऐसे में दुनिया के मुल्कों को समुद्री संसाधनों पर निर्भर होना पड़ेगा। दक्षिण पूर्व एशिया में अपने आप को दरोगा कहने वाले चीन को ये समझ में आ रहा है कि आने वाले पीढ़ियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए हिंद महासागर पर दबदबा कायम करना जरूरी है। लिहाजा वो पाकिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट को अपने लिए महत्वपूर्ण मान रहा है। चीन की इस रणनीति को नाकाम करने के लिए भारत को भी जगह की जरूरत थी जिससे वो हिंद महासागर के साथ साथ पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में अपनी पकड़ को मजबूत कर सके। चाबहार के तौर पर भारत को सामरिक जगह मिली जिसके जरिए वो चीन और पाकिस्तान को उनकी हद में रख सकता है।



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