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पैदा हो रहे हैं नए नए दलित चेहरे, मायावती के लिए कितनी बड़ी चुनौती

नई दिल्ली :  दलित राजनीति के लिहाज से 1980 का दशक बेहद महत्वपूर्ण है। दलित चेतना को उभारने में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक रहे कांशीराम की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1980 के दशक में कांशी राम के शिष्य के तौर पर मायावती का चेहरा भारतीय राजनीति की क्षितिज पर उभरने लगा। दलित विचारधारा को उन्होंने आंदोलन के रूप में संगठित किया और राजनीतिक दल के रूप जनता के सामने विचारों को पेश किया। बदलते समय के साथ मायावती का बहुजन का नारा सर्वजन में तब्दील हुआ। सर्वजन ने उनकी पुकार सुनी और 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में मायावती को जबरदस्त फायदा मिला। लेकिन 2012 से लेकर 2017 के चुनावी नतीजों ने बसपा को वेंटिलेटर पर ला दिया। बसपा के बहुजन और सर्वजन के नारों के बीच राजनीतिक फलक पर दो महत्वपूर्ण चेहरे चंद्रशेखर ऊर्फ रावण और जिग्नेश मेवाणी के रूप में अवतरित हुए हैं, जिनकी 20 करोड़ से ज्यादा दलित आबादी पर नजर है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मायावती अपनी पहचान को बरकरार रखने में कामयाब हो पाएंगी या नए चेहरों के बीच उनकी आभा निस्तेज हो जाएगी। इन सबके बीच सबसे पहले बात करेंगे गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की। जिग्नेश मेवाणी और दलित राजनीति 35 साल के जिग्नेश मेवाणी अपनी सोच को बस इतनी समझ दे परवरदिगार जब भी जहां भी सुख मिले तब सबका विचार दे, दुनिया में कइयों का ऋणी हूं मैं ‘मरीज’ चुकाना है सभी का कर्ज जो अल्लाह उधार दे के जरिए बयां करते हैं। गुजरात में ऊना घटना के बाद जिग्नेश की पहचान जिला स्तरीय राजनीति से बढ़कर प्रदेश स्तर की राजनीति तक पहुंच चुकी थी। उन्होंने खुद को गुजरात में दलित आंदोलन के चेहरे के तौर पर पेश किया। जिग्नेश बुलंद आवाज में कहा करते थे कि अब दलित समाज के मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने के लाथ मैला ढोने का काम नहीं करेंगे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की दांडी यात्रा से प्रेरणा लेते हुए दलित अस्मिता यात्रा निकाली। दिलचस्प बात ये है कि जिस वक्त जिग्नेश दलित समाज की भावना को उभारने में लगे थे, ठीक उसी वक्त कांग्रेस को ये समझ में आने लगा कि जिग्नेश के तौर पर हथियार मिल चुका है जिसकी मदद से वो भाजपा सरकार को गुजरात से उखाड़ फेकेंगे। कांग्रेस के नेताओं ने जिग्नेश से संपर्क साधा और मोदी सरकार पर हमला करना शुरू कर दिया। गुजरात के चुनावी नतीजों का एक पक्ष ये रहा कि अब कांग्रेस कहती है कि वो भले ही गुजरात नहीं जीत सकी लेकिन संघ और मोदी की विचारधार को टक्कर देने के लिए आ चुके हैं। इन सबके बीच जिग्नेश मेवाणी सड़क पर आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए विधानसभा में पहुंच चुके हैं। गुजरात चुनाव में अपनी छाप छोड़ने के बाद वो भीमा-कोरेगांव की घटना से एक बार फिर सुर्खियों में हैं। अभी कुछ दिनों पर महारों द्वारा पेशवा की सेना पर जीत को लेकर  जश्न मनाने के दौरान हिंसा हुई और महाराष्ट्र अशांत हो गया। ये बात अलग है कि जिन महारों ने इस्ट इंडिया की तरफ से पेशवा की सेना को मात दिया था उसी इस्ट इंडिया ने 1892 में महारों को भारतीय सेना में भर्ती करने से इनकार कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने तर्क दिया कि महार लड़ाकू नस्ल नहीं है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान महारों की सेना में नियुक्त किया लेकिन लड़ाई खत्म होते ही सबको बाहर कर दिया। जिग्नेश को बढ़ावा, कांग्रेस की चाल राज्यसभा के पूर्व सदस्य और स्तंभकार बलवीर पुंज कहते हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने वामपंथी साथी जिग्नेश मेवाणी का उपयोग ठीक उसी प्रकार कर रहे हैं जिस तरह पूर्व प्रधानंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब में अकालियों के राजनीतिक प्रभाव को कम करने हेतु जरनैल सिंह भिंडरावाले का किया था। यहां तक कि राजीव गांधी ने भिंडरावाले को संत कहकर संबोधित किया था। भिंडरावाले और कांग्रेस की जुगलबंदी से क्या परिणाम निकले, वह इतिहास की काली सूची में दर्ज है। जिग्नेश मेवाणी अपने वक्तव्यों में अक्सर दलित- मुस्लिम एकता की बात करते हैं। इसी तरह के गठजोड़ का आह्वान स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिम लीग ने देश के विभाजन के लिए किया था। इस गठजोड़ में बंगाल के दलित नेता जोगेंद्रनाथ मंडल भी शामिल हुए थे जो पाकिस्तानी संविधान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष और बाद में लियाकत सरकार में मंत्री बने। पूर्वी पाकिस्तान के हबीबगढ़ में अनुसूचित जाति के लोगों, विशेषकर हिलाओं पर बर्बर अत्याचार के बाद मंडल ‘दलित-मुस्लिम भाई-भाई’ नारे का सच जान गए। पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमनों को कट्टरपंथियों के वीभत्स उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा और मंडल भी पाकिस्तान से अपमानित होकर पुन: भारत लौट आए। चंद्रशेखर और दलित राजनीति चंद्रशेखर ने सहारनपुर में दलितों के संगठन भीम सेना की स्थापना की थी। 2016 में ये संगठन तेजी से उभरा। बहुत कम समय में ही चंद्रशेखर दलित समाज में लोकप्रिय भी हो गए। लेकिन पिछसे इसी साल मई में सहारनपुर में जातीय हिंसा हुई थी। ठाकुर और दलित समाज के लोगों के बीच हुई झड़पों में कई घर भी जला दिए गए थे। पुलिस ने चंद्रशेखर पर इस हिंसा की साजिश रचने और भीड़ का नेतृत्व करने के आरोप लगाया है। चंद्रशेखर के भाई कहते हैं कि आप जानते हैं इस समय यूपी में किसकी सरकार है और जो चंद्रशेखर के साथ हो रहा है उसके पीछे कौन है। मायावती का राजनीतिक उत्थान और अवसान मायावती ने अपनी लोकप्रिय किताब 'मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेंट का सफरनामा' में लिखा है कि जिस तरह बहुजन समाज पार्टी बहुजन समाज के गौरव का प्रतीक है, वैसे ही बुद्धिजीवियों की नजर में मायावती भारतीय राजनीति में एक ऐसी नेता बनकर उभरीं हैं जिनकी आलोचना की जा सकती है, आरोप भी लगाए जा सकते हैं, लेकिन कोई उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता है। मायावती ने आगे लिखा है कि मैंने अपने आपको एक ऐसी चट्टान की तरह ढाला है जो पिघलती नहीं, बल्कि नदियों का रास्ता बदलती है। 1991 में बीएसपी 12 सीटें जीती और 2007 में पार्टी ने सर्वाधिक 206 सीटें हासिल की। लेकिन 2017 में पार्टी 27 सीटों पर सिमटकर रह गई। पार्टी के बुरे प्रदर्शन से परेशान मायावती ने दो स्तरीय राजनीतिक योजना को सामने रखा जो कि राजनीति में प्रासंगिक बने रहने और अपने परिवार को कानूनी कार्यवाहियों से बचाने की उनकी हड़बड़ी को दिखाता है। आखिरी बार कांग्रेस के साथ गठबंधन में 1996 में चुनाव लड़ने के बाद से कड़ा रुख बनाए रखने वाली मायावती ने पहली बार बीजेपी विरोधी फ्रंट में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है। आज तक उन्होंने अकेले ही रास्ता तय किया। उन्हें जिनकी जरूरत थी उनसे नाता तोड़ा और जिन्हें उनकी जरूरत हो सकती थी, कठोरता पूर्वक सहयोगियों को सत्ता से हटाया। दैनिक जागरण से खास बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने कहा कि राजनीति ठहरे हुए पानी की तरह नहीं होती है। राजनीति में समीकरण, लोगों की उम्मीद समय के साथ बदलती रहती है। आप कभी भी भावनात्मक राजनीति को लंबे समय तक हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। जिस वक्त कांशीराम और मायावती यूपी की सड़कों और गलियों में घूमा करते थे उस समय स्थितियां अलग थी। 1980 के दशक का समाज सामंती सोच से ज्यादा प्रभावित था। आप उसकी झलक यूपी में 90 के दशक में  सपा-बसपा गठबंधन की सरकार में देख सकते हैं। लेकिन राजनीति की गुणा और गणित ने दोनों को एक दूसरे से अलग कर दिया, जिसका असर बसपा के अवसान के रूप में नजर आने लगा। समय के साथ बसपा ने बहुजन के नारे को त्याग कर सर्वजन के नारे पर भरोसा किया और वो 2007 में कामयाब भी हुआ। लेकिन प्रशासनिक नाकामी ने 2012 में बसपा को सत्ता से बाहर कर दिया। इस बीच राष्ट्रीय फलक पर गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी अवतरित हो रहे थे। मोदी ने एक अलग तरह के राजनीतिक बदलाव का नारा बुलंद किया जिसका असर ये हुआ कि बसपा का देश के सबसे बड़े सूबे में सफाया हो गया। राजनीतिक तौर हासिए पर जाने की वजह से दलित समाज के नए चेहरों का उदय हुआ।



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