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दिनेश्वर शर्मा का मिशन कश्मीर अब तक कितना रहा सफल

श्रीनगर : कश्मीर में समस्या का समाधान तलाशने के लिए केन्द्र की तरफ से छह दिवसीय दौरे पर सोमवार को पहुंचे वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा के मिशन कश्मीर को अब तीन दिन से ज्यादा हो गए हैं। वे अगले दो दिन जम्मू में लोगों की नब्ज टटोलेंगे और उसके बाद दिनेश्वर शर्मा वापस दिल्ली लौट आएंगे। ऐसे में भले ही दिनेश्वर शर्मा के दौरे को अच्छा कहा जाए लेकिन, उनके दौरे को लेकर जिस तरह के कयास लगाए जा रहे थे हकीकत में उतना कारगर होता हुआ नहीं दिख रहा है। जिसके लिए पाकिस्तान समेत कई फैक्टर जिम्मेदार है। केन्द्र की उम्मीद हैं दिनेश्वर शर्मा खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को पिछले महीने अक्तूबर में जिस समय केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सभी को हैरान करते हुए कश्मीर में अमन बहाली और कश्मीर समस्या के समाधान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें केंद्र की ओर से वार्ताकार वार्ताकार नियुक्त किया था उस वक्त पूरे कश्मीर के लोगों को समस्या हल की दिशा में एक उम्मीद किरण नज़र आयी थी। कश्मीर के सभी स्थानीय सियासी दल जो मुख्यधारा से लेकर अलगाववादी खेमे तक बंटे हुए हैं, केन्द्र के इस कदम से काफी आशान्वित नज़र आए। अतीत के कड़वे अनुभवों को अब तक महसूस कर रहे आम लोग भी उम्मीद लगाए बैठे थे कि चलो अब मसले के हल की प्रक्रिया शुरु हो जाएगी। लेकिन चंद ही घंटों में उम्मीदों पर पानी फिर गया। अलगाववादी संगठनों से बातचीत नहीं प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री डा. जितेंद्र सिंह ने हुर्रियत और अन्य अलगाववादी संगठनों से बातचीत को नकार दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑटोनॉमी का विकल्प सिरे से खारिज करते हुए इसे आजादी से जोड़ दिया और कहा कि ऐसा कोई भी विकल्प देश के शहीदों के साथ अन्याय है। डा. जितेंद्र सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि दिनेश्वर शर्मा वार्ताकार नहीं बल्कि केन्द्र के प्रतिनिधि हैं और बातचीत की प्रक्रिया पहले से जारी है। बस वह उसे आगे बढ़ाने और संबधित पक्षों से लगातार संवाद के लिए हैं। उमर को केंद्र की पहल नहीं आई पसंद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी दिनेश्वर शर्मा के कश्मीर दौरे को लेकर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि बातचीत की प्रक्रिया तभी आगे चलती है, लोग बात करने तभी आते हैं, जब उन्हें कुछ मिलने की उम्मीद होती है। उन्होंने कहा कि केन्द्र ने पहले ही सभी विकल्पों को खारिज कर दिया, फिर कौन बात करने आएगा। रही बात मेरे मिलने की तो मैं निजी हैसियत से ही मिला हूं। पाक ने कहा- कश्मीर पर बात को गंभीर नहीं नई दिल्ली केंद्र सरकार की तरफ से दिए बयान ने अलगाववादियों को जहां बातचीत से पीछे हटने का रास्ता दिया, वहीं पाकिस्तान की तरफ से कहा गया कि नई दिल्ली की यह पहल सिर्फ छलावा है। वह कश्मीर मसले को हल करने के लिए गंभीर नहीं, क्योंकि इसमें इस्लामाबाद शामिल नहीं है। पाकिस्तान जो कश्मीर में लगातार आतंकवाद और अलगाववाद का हर तरह से पोषक और संरक्षक है उसकी तरफ से ऐसा बयान अलगाववादी खेमे में उन लोगों के लिए एक संदेश था जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रुप से बातचीत की प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए अवसर तलाश रहे थे। उन्हें बड़े ही शालीन तरीके से पाकिस्तान ने बातचीत की प्रक्रिया से दूर रहने के लिए समझा दिया। हुर्रियत ने बातचीत से पल्ला झाड़ा इस्लामाबाद की न होने के बाद कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों के साझा मंच यूनाईटेड जिहाद कौंसिल के चेयरमैन मोहम्मद युसुफ डार उर्फ सल्लाहुदीन ने भी दिनेश्वर शर्मा के मिशन का विरोध करते हुए कहा कि कश्मीर मसले पर बातचीत नई दिल्ली-पाकिस्तान-कश्मीरियों के बीच हो, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव लागू हों। अन्यथा कोई बातचीत नहीं। पाकिस्तान और जिहाद कौंसिल की न के बाद हुर्रियत समेत कोई भी अलगाववादी संगठन या नेता केंद्र के साथ बातचीत के लिए हाथ नहीं बढ़ा सकता और हुआ भी यही। हुर्रियत ने बातचीत से पल्ला झाड़ते हुए साफ कर दिया वह इस प्रक्रिया से दूर रहेगी, क्योंकि इसमें कश्मीर मसले को हल करने के लिए कोई एजेंडा नहीं है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस बिना शर्त नहीं करेगी बात कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ अहमद अली फैयाज ने कहा कि यहां सभी जानते हैं कि हुर्रियत कांफ्रेंस तभी नई दिल्ली से बातचीत करेगी, जब पाकिस्तान का समर्थन होगा। उन्होंने कहा कि अतीत में हमने देखा है कि पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2 पर किसी हद तक नई दिल्ली की सहमति बनने पर ही हुर्रियत बातचीत की मेज पर आयी है। इसके अलावा केंद्र सरकार की तरफ से जिस तरह के बयान जारी हुए, उससे तो केंद्र की नियत पर ही हमें शक होता है। केंद्र की तरफ लगातार परस्पर विरोधी, असमंजसपूर्ण और भड़काऊ बयान आए जिन्होंने अलगाववादी खेमे को बातचीत से दूर रहने का एक मजबूत आधार दिया। हुर्रियत से बातचीत क्यों है जरुरी वरिष्ठ पत्रकार बशीर मंजर ने कहा कि आप यहां हुर्रियत या उस जैसे संगठनों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। बेशक आप कहें कि हुर्रियत का जनाधार नहीं है, लेकिन वह एक विचार और भावना का प्रतिनिधित्व करती है जो कश्मीर में कहीं न कहीं मजबूत है। अगर ऐसा न होता तो फिर यहां विवाद क्यों होता। आप आजादी नहीं दे, आटोनामी न दे, सेल्फ रुल न दें, लेकिन यह तो कह सकते थे कि जो भी कश्मीर समस्या का हल चाहता है, जिस तरह से चाहता है, वह अपने रोडमैप के साथ आए। बातचीत होती और आगे बढऩे के लिए कुछ न कुछ जमीन तैयार होती। दिनेश्वर शर्मा सोमवार की दोपहर से लेकर बुधवार की शाम तक कश्मीर में 50 से ज्यादा लोगों से मिल चुके थे। लेकिन, मिलनेवालों में अगर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को छोड़ दें तो फिर वही कुछ खास बुद्धिजीवी, आटो रिक्शाचालकों और व्यापारियों व खिलाडिय़ों के प्रतिनिधि ही शामिल हैं। उनके मुददों में सिर्फ प्रशासनिक रियायतें ही रही हैं। लेकिन कोई भी उनमें से कश्मीर की सियासत पर निर्णायक बातचीत करने या राय देने में समर्थ नहीं है। जो समर्थ थे, उन्होंने भी बातचीत में पाकिस्तान और हुर्रियत की भूमिका की महत्ता पर ही जोर दिया है। वैसे भी बातचीत उन्हीं से होती है जो लकीर के पार होते हैं। जो आपके साथ हैं, वह सिर्फ मदद कर सकते हैं, फैसला नहीं।



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