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नीतीश कुमार की नहीं सुनते थे लालू यादव के मंत्री, तंग आकर लिया फैसला!

बिहार में साल 2015 में जब 20 साल बाद नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव साथ आए थे, तभी से यह माना जा रहा था कि यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चलेगा. मीडिया में भी इसे लेकर काफी कुछ लिखा गया था. आखिरकार यह सच साबित हुआ और बुधवार को आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस का बीजेपी विरोधी महागठबंधन 20 माह तक सरकार चलाने के बाद टूट गया. वैसे तो इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जिसमें लालू परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप प्रमुख हैं, लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इसका एक अन्य कारण लालू यादव के कोटे के मंत्रियों का सीएम नीतीश कुमार के आदेशों को नहीं मानना भी रहा. बताया जा रहा है कि नीतीश इससे तंग आ गए थे और खुद को अपमानित महसूस करते थे. जहां नीतीश कुमार सबको साथ लेकर चलने वाले नेता माने जाते हैं और उनकी छवि बेदाग है, वहीं लालू यादव दबंग छवि वाले राजनेता हैं. यह उनके बयानों से भी झलकता रहा है. बुधवार का ही बयान लीजिए उन्होंने जोर देकर साफ किया था कि तेजस्वी किसी भी हाल में इस्तीफा नहीं देंगे, जबकि नीतीश चाहते थे कि वह इस्तीफा दें. मतलब लालू ने नीतीश की बात नहीं मानीं. बस उनके इसी रुतबे के अनुसार लालू की पार्टी के मंत्री भी नीतीश से कुछ ऐसा ही व्यवहार करते थे. शहाबुद्दीन ने कहा था लालू हैं उसके नेता मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो जेडीयू के नेताओं ने कई बार इस पर खुलासा भी किया था और नीतीश की तकलीफ व्यक्त की थी. जेडीयू ने नेताओं ने यह भी बताया था कि नीतीश इस बात से बहुत नाखुश रहते थे कि लालू के कोटे के मंत्री तो उन्हें जैसे मुख्यमंत्री ही नहीं समझते. इतना ही नहीं वह अपने अहम फैसले लालू यादव के कहे अनुसार ही लेते थे. यहां तक कि कुख्यात अपराधी मोहम्मद शहाबुद्दीन ने तो जमानत पर छूटने के बाद साफतौर पर लालू यादव को ही अपना नेता बताया था और नीतीश कुमार को अपना नेता मानने से इनकार कर दिया था. मतलब लालू के मंत्री और नेता दबंगई वाला व्यवहार रखते थे. जेडीयू तोड़ने की भी की थी कोशिश सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार बीजेपी के खिलाफ बने गठबंधन को पूरे पांच साल चलाना चाहते थे, लेकिन लालू यादव और उनके कुछ पुराने सहयोगी इस कोशिश में लगे हुए थे कि जेडीयू में फूट पड़ जाए और वह कांग्रेस और जेडीयू के बागी विधायकों के साथ सरकार बना लें. ऐसा इसलिए क्योंकि लालू परिवार पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे और उन पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा था. जेडीयू सूत्रों की मानें तो लालू ने दो केंद्रीय मंत्रियों तक अपने दूत भेजे थे. उन्होंने अपने परिवार पर आए कानूनी पचड़े को दूर करने के लिए उनसे मदद मांगी थी और उसके बदले बिहार में नीतीश को सत्ता से बाहर करने की पेशकश की थी. नीतीश की छवि को हो रहा था नुकसान साल 2015 में जब कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू का महागठबंधन बना था, तभी से इसे बेमेल बताया जा रहा था. नीतीश की साप सुथरी छवि को भी इसे धक्का माना ज रहा था. हालांकि लालू सत्ता से दूर रहे, लेकिन अपने दोनों बेटों को सरकार में शामिल करा दिया. इन दोनों के कामों से भी नीतीश सरकार की छवि को काफी नुकसान पहुंचा. फिर तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने ताबूत में आखिरी कील का काम कर दिया.



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